Parkinson Disease : विश्व पार्किन्सन दिवस पर ITSA Hospitals रायपुर में विशेषज्ञों ने बताए शुरुआती लक्षण, जोखिम और आधुनिक इलाज के तरीके, युवाओं में बढ़ते मामलों पर जताई चिंता

Parkinson Disease / रायपुर। विश्व पार्किन्सन दिवस के अवसर पर ITSA Hospitals में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने Parkinson’s disease (पार्किन्सन रोग) के लक्षण, जोखिम, उपचार और पुनर्वास को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। इस दौरान न्यूरोलॉजी, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, मनोविज्ञान और इंटरनल मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने रोग के अलग-अलग पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। Parkinson Disease
पार्किन्सन दुनिया का दूसरा सबसे आम न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग
कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अभिजीत कुमार कोहट ने बताया कि Parkinson’s disease दुनिया में दूसरा सबसे आम न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार है। यह मुख्य रूप से कंपकंपी (ट्रेमर), शरीर की धीमी गति और जकड़न से पहचाना जाता है।
उन्होंने बताया कि यह रोग सामान्यतः वृद्धावस्था में शुरू होता है, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। इसका मुख्य कारण मस्तिष्क में डोपामिन की कमी होना है, जिससे शरीर की गतिविधियों का संतुलन बिगड़ता है।
शुरुआती लक्षण जिन्हें नजरअंदाज न करें
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न संकेत शुरुआती चेतावनी हो सकते हैं—
- हाथों का हल्का कांपना
- लिखावट का छोटा हो जाना
- आवाज का धीमा होना
- चेहरे के भाव कम होना
- सूंघने की क्षमता में कमी
उन्होंने कहा कि समय पर इलाज शुरू करने से रोग को लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है। शुरुआती वर्षों में दवाओं का प्रभाव अच्छा रहता है, लेकिन बाद में असर कम होने पर डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) सर्जरी उपयोगी साबित हो सकती है, जिससे कई मामलों में दवाओं की मात्रा लगभग 50% तक कम हो सकती है।
फिजियोथेरेपी से गिरने का खतरा होता है कम
फिजियोथेरेपी विभाग की प्रमुख डॉ. तनुश्री नेरल ने बताया कि पार्किन्सन मरीजों के लिए LSVT BIG नामक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रोग्राम अपनाया जाता है।
इस प्रोग्राम में—
- बड़े मूवमेंट्स की एक्सरसाइज
- स्ट्रेंथ और स्टेबिलिटी ट्रेनिंग
- बैलेंस और कोऑर्डिनेशन सुधार
पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम आमतौर पर सप्ताह में 4 दिन और महीने में 16 सेशंस के रूप में तैयार किया जाता है, जिससे मरीजों के गिरने का जोखिम कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
डायबिटीज और खराब जीवनशैली बढ़ा सकती है जोखिम
डायरेक्टर और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. राजकुमार बरनवाल ने बताया कि लंबे समय से Diabetes mellitus से पीड़ित और अनियंत्रित शुगर वाले बुजुर्गों में Parkinson’s disease का खतरा बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि—
- लंबे समय तक अनियंत्रित डायबिटीज
- उच्च रक्तचाप
- मोटापा
- निष्क्रिय जीवनशैली
मस्तिष्क पर असर डालते हैं और जोखिम बढ़ा सकते हैं।
ऐसे में ब्लड शुगर नियंत्रण, नियमित व्यायाम और संतुलित आहार बेहद जरूरी है।
स्पीच थेरेपी से आवाज और निगलने की क्षमता में सुधार
ऑडियोलॉजिस्ट एवं स्पीच थेरेपिस्ट जितेश कुमार ठाकुर ने बताया कि पार्किन्सन मरीजों में बोलने और निगलने से जुड़ी समस्याएं आम होती हैं।
उन्होंने कहा कि मरीजों की स्पीच और स्वैलोइंग का विस्तृत आकलन कर व्यक्तिगत थेरेपी दी जाती है, जिससे—
- आवाज स्पष्ट होती है
- बोलने में सुधार होता है
- सुरक्षित निगलना सीखा जा सकता है
साथ ही परिवार के सदस्यों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे मरीज की जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है गहरा असर
मनोवैज्ञानिक एशिका जायसवाल ने बताया कि Parkinson’s disease केवल शरीर की चाल-ढाल को ही नहीं, बल्कि सोचने और महसूस करने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।
उन्होंने बताया कि मरीजों में—
- अवसाद
- चिंता
- स्मृति में कमी
- व्यवहार में बदलाव
जैसी समस्याएं देखी जाती हैं। इसके आकलन के लिए MoCA, BDI और NMSS जैसे परीक्षणों का उपयोग किया जाता है।
समग्र इलाज ही है बेहतर जीवन की कुंजी
प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में ITSA Hospitals के विशेषज्ञों ने संदेश दिया कि पार्किन्सन रोग का इलाज केवल दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें—
- न्यूरोलॉजी उपचार
- फिजियोथेरेपी
- स्पीच थेरेपी
- मनोवैज्ञानिक सहायता
- संतुलित जीवनशैली
जैसे सभी पहलुओं को मिलाकर समग्र (Comprehensive) उपचार अपनाना जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि “जल्दी पहचान, सही उपचार और निरंतर देखभाल” से पार्किन्सन मरीज सामान्य और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।



















