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High Court On No Work No Pay: कर्मचारी के हक में ऐतिहासिक फैसला, सरकार को 4 महीने में भुगतान का आदेश

समय पर पदोन्नति नहीं मिलने पर सेवानिवृत्त अधिकारी को राहत, हाईकोर्ट ने कहा- विभागीय गलती के लिए कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता

High Court On No Work No Pay: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ‘नो वर्क, नो पे’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह नियम हर मामले में स्वतः लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही या प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण पदोन्नति का लाभ समय पर नहीं मिला हो।

सेवानिवृत्त अधिकारी ने लगाई थी याचिका

मामला सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जी.आर. साहू से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दावा किया था कि वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें समय पर डिप्टी कमिश्नर पद पर पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को वर्ष 2011 में ही प्रमोशन मिल गया था।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि विभागीय समीक्षा पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) ने याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए उपयुक्त माना था और उन्हें उनके जूनियर अधिकारियों से ऊपर रखने की अनुशंसा भी की थी। इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की।

सरकार ने दिया ‘नो वर्क, नो पे’ का तर्क

मामले में मुख्य विवाद 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 (सेवानिवृत्ति तिथि) तक की अवधि के वेतन लाभ को लेकर था। राज्य सरकार ने दलील दी कि चूंकि याचिकाकर्ता ने डिप्टी कमिश्नर पद पर वास्तविक कार्य नहीं किया, इसलिए उन्हें उस पद का वेतन नहीं दिया जा सकता।

वहीं याचिकाकर्ता का कहना था कि विभागीय लापरवाही के कारण उन्हें पदोन्नत पद पर कार्य करने का अवसर ही नहीं मिला।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता पदोन्नत पद पर कार्य नहीं कर पाए, लेकिन इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार नहीं थे। विभाग की निष्क्रियता के कारण उन्हें पदोन्नति का लाभ नहीं मिल सका।

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में ‘नो वर्क, नो पे’ सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी की कोई गलती नहीं है, तो उसे पूरी तरह वेतन लाभ से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा।

राज्य सरकार को दिया यह निर्देश

हाईकोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक की अवधि के लिए डिप्टी कमिश्नर और सहायक आयुक्त के वेतन के अंतर की राशि का 50 प्रतिशत एरियर्स याचिकाकर्ता को भुगतान किया जाए।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यह राशि चार महीने के भीतर अदा की जाए। निर्धारित समयसीमा में भुगतान नहीं होने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

फैसले का महत्व

यह फैसला उन सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें विभागीय देरी, प्रशासनिक त्रुटि या प्रमोशन प्रक्रिया में लापरवाही के कारण समय पर पदोन्नति नहीं मिल पाती। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि विभागीय गलती का खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतना चाहिए।

Kirti Goswami

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