हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: विभागीय जांच और आपराधिक केस साथ-साथ चल सकते हैं….
भ्रष्टाचार मामले में याचिका खारिज, रिश्वत लेते पकड़े गए रेलवे अधिकारी पर जारी रहेगी दोहरी कार्रवाई

हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा एक साथ चलाया जा सकता है। हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए संबंधित याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि दोनों प्रक्रियाओं के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं, इसलिए इन्हें समानांतर रूप से चलाने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
क्या है पूरा मामला?
मामला South East Central Railway (SECR) नागपुर मंडल में पदस्थ एक अधिकारी से जुड़ा है।
आरोपी अनूप कुमार आवले, जो मुख्य कर्मचारी एवं कल्याण निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे, को CBI की एंटी करप्शन ब्रांच ने 2 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
आरोप है कि उन्होंने एक मृत रेलवे कर्मचारी की पत्नी से अनुकंपा नियुक्ति और सेवा लाभ दिलाने के बदले 2.40 लाख रुपये की मांग की थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
डिवीजन बेंच में शामिल जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने कहा:
- विभागीय जांच और आपराधिक केस दोनों अलग प्रकृति के होते हैं
- आपराधिक मुकदमा लंबित होने के कारण विभागीय कार्रवाई नहीं रोकी जा सकती
- लंबे समय तक केस लंबित रहने से प्रशासनिक कार्रवाई बाधित नहीं होनी चाहिए
कोर्ट ने साफ किया कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में प्रशासन को त्वरित कार्रवाई का पूरा अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाई कोर्ट ने Captain M. Paul Anthony vs Bharat Gold Mines Ltd मामले का हवाला देते हुए कहा कि:
विभागीय जांच तभी रोकी जा सकती है जब मामला अत्यधिक जटिल हो
सामान्य परिस्थितियों में दोनों कार्रवाई साथ चल सकती हैं
क्या हो सकती है सजा?
अगर आरोप साबित होते हैं, तो आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई संभव है:
- 3 से 7 साल तक की सजा (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत)
- नौकरी से बर्खास्तगी
- पेंशन और अन्य लाभ समाप्त
इसके अलावा रेलवे सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1968 के तहत भी विभागीय कार्रवाई जारी रहेगी।


















