High Court का बड़ा फैसला: साथ रहने से संपत्ति नहीं बनती संयुक्त परिवार की, जिला अदालत ने सुनाया बड़ा फैसला
बिलासपुर जिला अदालत ने कहा- सिर्फ एक साथ रहने और भोजन करने से स्व-अर्जित संपत्ति पर नहीं बनता पारिवारिक हक

High Court का बड़ा फैसला: Bilaspur की जिला अदालत ने संयुक्त हिंदू परिवार और पैतृक संपत्ति को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल परिवार के साथ रहना, एक साथ भोजन करना या पारिवारिक सहयोग देना किसी सदस्य की स्व-अर्जित संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं बना देता। High Court का बड़ा फैसला
दशम जिला जज Aditya Joshi की अदालत ने सिविल जज क्लास-2 के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए अतुल कशवाल की अपील स्वीकार कर ली और दीप्ति कशवाल व अन्य द्वारा प्रस्तुत दावा खारिज कर दिया। High Court का बड़ा फैसला
क्या था पूरा मामला?
दरअसल मामला मोपका और दर्रीघाट स्थित जमीनों तथा बैंक जमा राशि के स्वामित्व से जुड़ा था। दीप्ति कशवाल ने अदालत में दावा किया था कि विवादित संपत्तियां संयुक्त हिंदू परिवार की हैं और उनके बच्चों को भी उसमें हिस्सा मिलना चाहिए।
वहीं अतुल कशवाल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संबंधित संपत्तियां स्वर्गीय शिवप्यारे की स्व-अर्जित संपत्ति थीं, जिन पर उनका व्यक्तिगत अधिकार और नियंत्रण था।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति घोषित कराने का दावा करने वाले पक्ष पर यह साबित करने की जिम्मेदारी होती है कि परिवार के पास ऐसा पैतृक कोष या आय का स्रोत था, जिससे विवादित संपत्ति खरीदी गई हो।
कोर्ट ने पाया कि वादी पक्ष इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। न कोई राजस्व दस्तावेज, न आय संबंधी रिकॉर्ड और न ही ऐसा प्रमाण पेश किया गया जिससे यह साबित हो सके कि संपत्तियां संयुक्त परिवार के संसाधनों से खरीदी गई थीं।
स्वर्गीय शिवप्यारे के व्यक्तिगत नियंत्रण को माना आधार
अदालत ने अपने फैसले में यह भी माना कि स्वर्गीय शिवप्यारे स्वतंत्र रूप से जमीन की खरीद-बिक्री करते थे, बैंक खातों का संचालन स्वयं करते थे और कानूनी मामलों में भी व्यक्तिगत रूप से निर्णय लेते थे।
इन तथ्यों के आधार पर जिला अदालत ने माना कि विवादित संपत्तियों पर उनका व्यक्तिगत स्वामित्व था और उन्हें संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता।
निचली अदालत का आदेश निरस्त
इन सभी तथ्यों को देखते हुए जिला जज ने निचली अदालत की डिक्री को निरस्त कर दिया और विवादित संपत्तियों को स्व-अर्जित संपत्ति घोषित कर दिया।
यह फैसला संयुक्त परिवार और पैतृक संपत्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।









