CG High Court: प्रतिनियुक्ति विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा निर्देश, पहले विभाग जाएं कर्मचारी, 45 दिन में होगा फैसला
प्रतिनियुक्ति मामले में हाईकोर्ट का निर्देश, विभाग 45 दिन में ले फैसला

CG High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति (Deputation) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को पहले विभागीय स्तर पर समाधान तलाशने की सलाह दी है। अदालत ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया है कि अभ्यावेदन प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर नियमानुसार और कारणयुक्त निर्णय लिया जाए।
मामला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले के कोटमीकला स्थित प्री-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास में छात्रावास अधीक्षक पद पर प्रतिनियुक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता शंकर प्रसाद प्रजापति ने 13 मार्च 2026 को जारी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान बदला रुख
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि वे फिलहाल याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहते और विभागीय अधिकारियों के समक्ष विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करना चाहते हैं। इस पर उन्होंने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने अनुरोध स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को विभाग के समक्ष अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता प्रदान की और याचिका का निराकरण कर दिया।
विभाग को 45 दिन में फैसला लेने का आदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता विभागीय अधिकारियों के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध दस्तावेजों, तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर 45 दिनों के भीतर उचित निर्णय लें।
अदालत ने कहा कि निर्णय पूरी तरह विधि सम्मत और कारणयुक्त होना चाहिए ताकि विवाद का निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित हो सके।
गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के मेरिट यानी गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। इसलिए विभागीय अधिकारी स्वतंत्र रूप से रिकॉर्ड और नियमों के आधार पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
विभागीय समाधान को दी प्राथमिकता
अदालत ने सेवा संबंधी मामलों में विभागीय उपायों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि कर्मचारियों को न्यायालय की शरण लेने से पहले उपलब्ध प्रशासनिक और विभागीय विकल्पों का उपयोग करना चाहिए। इससे कई मामलों का समाधान प्रारंभिक स्तर पर ही संभव हो सकता है और अनावश्यक न्यायिक प्रक्रिया से बचा जा सकता है।
अब याचिकाकर्ता विभागीय अधिकारियों के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे, जबकि संबंधित विभाग को 45 दिनों के भीतर मामले पर अंतिम निर्णय लेना होगा।








