Social Media Fake News Opinion: सोशल मीडिया बना झूठ का ‘म्युचुअल फंड’, आम जनता जोखिम में और नेताओं का मुनाफा पक्का
फर्जी पोस्ट, आईटी सेल और डिजिटल प्रचार के बीच सच ढूंढना हुआ मुश्किल; सभी दलों को मिलकर ‘मिथ्या संदेश रोकथाम समिति’ बनाने की उठी मांग

Social Media Fake News Opinion : आज के डिजिटल दौर में सच को ढूंढना उतना ही कठिन होता जा रहा है, जितना घने कोहरे में सूरज को देख पाना। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से बढ़ते फर्जी समाचार और भ्रामक पोस्टों ने सूचना के प्रवाह को जटिल बना दिया है।
स्व-घोषित न्यूज़ पोर्टल, यू-ट्यूबर और तथाकथित फर्जी पत्रकार सूचना के नाम पर ऐसी सामग्री प्रसारित कर रहे हैं, जिससे आम नागरिक भ्रमित हो रहा है। पहले यह स्थिति एकतरफा प्रतीत होती थी, लेकिन अब विभिन्न विचारधाराओं के लोग डिजिटल माध्यमों पर सक्रिय होकर एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं।
डिजिटल प्रचार की दौड़ में दोनों पक्ष सक्रिय
समय के साथ सोशल मीडिया पर प्रचार का स्वरूप बदल गया है। अब विभिन्न राजनीतिक और वैचारिक समूह एक-दूसरे के खिलाफ डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं।
इस स्थिति में समर्थक और विरोधी दोनों ही अपनी-अपनी पोस्टों पर प्रतिक्रिया देते हुए एक-दूसरे को चुनौती दे रहे हैं। परिणामस्वरूप, आम नागरिक सही जानकारी की पहचान करने में असहज महसूस कर रहा है।
फर्जी खबरों पर नियंत्रण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह सुझाव सामने आया है कि सभी राजनीतिक दलों को मिलकर ‘मिथ्या संदेश रोकथाम एवं निवारण समिति’ का गठन करना चाहिए।
ऐसी समिति का उद्देश्य सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही भ्रामक और झूठी जानकारी को नियंत्रित करना और जनता तक सही सूचना पहुंचाना हो सकता है। साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जिम्मेदारी और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में भी यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
आम जनता पर सबसे ज्यादा असर
फर्जी खबरों और भ्रामक सूचनाओं का सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है। लगातार बढ़ती गलत जानकारी के कारण लोगों में भ्रम और असंतोष की स्थिति बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में सूचना की सत्यता की जांच करना और विश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा करना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
लेखक परिचय:
इंजी. मधुर चितलांग्या “माधो”













